Tuesday, June 16, 2015

योग: शक्ति है भक्ति नहीं !!!

योग को आज एक अहम मुद्दा बनाकर पेश कर रहें हैं लोग। कोई धर्म से जोड़ रहा कोई जात से कोई राजनीति से तो कोई स्वार्थ सिद्धि के लिए, कुछ के लिए ये तो मात्र एक चटपटी मसाले दार खबर।

मित्रों योग का अर्थ ही है मिलन।

योग एक शारीरिक और मानसिक क्रिया है एक सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रण करने का सहज उपाय है।आदिकाल से ये विधा प्रचलित है। योग की शुरुआत भारत में पूर्व-वैदिक काल में हुई मानी जाती है योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्रीलंका गया और अब तो लगभग पूरा विश्व ही इससे परिचित है। इसकी कोई जाति धर्म या रंग नही है। स्वस्थ रहने की एक विधा है। आज हमसब लाखों करोड़ों खर्च करके भी अस्वस्थ रहतें है दवा के बिना हम चल फिर नही सकते। अगर हम घर बैठे यौगिक क्रियाएँ करके खुद को स्वस्थ रख सकतें हैं तो इसमें बुराई क्या।हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी यदि देश की जनता को स्वस्थ निरोगी तथा ऊर्जावान बनाना चाहतें हैं तो उसमे बुराई कहाँ? क्यों हम किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम देने की जगह उसे इतना जटिल और विवादित बना देतें हैं जिसमे फायदा हम सबका ही है।
आज हमारे बच्चे, हमसब और युवा वर्ग थका हुआ निस्तेज और बड़ी बड़ी बिमारियों से घिरे हैं जिससे अवसाद उत्पन्न हो रहा और समय से पहले बूढ़ा या मृत्यु को प्राप्त हो रहा। हमारे अंदर नकारात्मकता जैसे विषैले पदार्थ का ढेर एकतत्रित हो रहा और हम निरंतर अवनति की ओर जा रहें हैं।
योग में कौन से देवता विराज रहें कोई ये बताएगा। जो हमारे मुस्लिम भाई या मित्र ये कहतें हैं कि योग धर्म से जुड़ा है तो ये निरर्थक है। हम सर झुकाते हैं ईश्वर के सामने तो मुस्लिम भाई भी सजदा करते हैं अल्लाह के सामने।सिख ईसाई सभी धर्म में सर झुकाया जाता है अपने ईष्ट के सामने।कभी आप सभी ने सोचा कि हमारे ईष्ट कौन हैं?
हम एक अदृश्य शक्ति को अपना ईष्ट मानते हैं चूँकि मनुष्य भी एक उषश्रृंखल जीव है इसीलिए हमारे पूर्वजों ने संयमके लिए ये नियम बनाये और हमे एक दिशा दी।
सूर्य नमस्कार में देवता नही एक शक्तिशाली ग्रह को हम नमस्कार करतें हैं इबादत करतें हैं जिनसे हमे और सम्पूर्ण जगत को ऊर्जा मिलती है। जिन ग्रहों से हमे प्राकृतिक सम्पदा और जीवन मिलता है क्या उसका शुक्रिया अदा करना हमारा कर्तव्य या मानवता नही। यहाँ धर्म कहाँ आया।
क्या दूसरे धर्मों के लोग सूर्य से धूप,ऊर्जा या रौशनी नही लेतें क्या शुद्ध हवा और पेड़ पौधों से ऑक्सीज़न नही लेते क्या पानी नही पीते क्या चंद्रमा की चांदनी और शीतलता नही लेते क्या रात और दिन का उपयोग नही करते क्या पहाड़, समंदर,धरित्री से निकले खनिज सम्पदा का उपयोग नही करते अगर हाँ तो बताएं मुझे वो किस धर्म या जाति के हैं ? क्यों नही इन्हें धर्म या जाति से जोड़ते? हम सभी इन ग्रहों और शक्तियों से मिली सम्पदाओं को जीवन जीने के लिए इस्तेमाल करतें है तथा जीवन पाते हैं तो क्या उनका धन्यवाद करना उचित नही हमारा नैतिक कर्तव्य नही। तो क्या गुनाह करते हैं जो हम इन सभी शक्तियों को नमन और शुक्रिया अदा करते हैं।
सारे यौगिक क्रियाएँ सिर्फ और सिर्फ ऊर्जा,निरोगी और वीभत्स मानसिकता को दूर करने का उपाय मात्र है। मुस्लिम धर्म में भी ये क्रियाएं हैं नमाज़ में भी वही सारे आसन हैं बस नाम अलग हैं।हम जानकारी के अभाव में इस तरह के प्रलाप करतें हैं।
          मित्रों अ से ॐ अ से ही तो अल्लाह है। किसने देखा भगवान् और खुदा को।जब हमे बनाने वाले ने हमे अलग अलग नही बनाया तो हमसब क्यों एक दूसरे को अलग श्रेणियों में डाल कर विभिन्न धर्म और जात पांत बनातें है। सिर्फ एक अदृश्य शक्ति है जो हमारा संचालन करती है हमे उन्ही का शुकराना अदा करना चाहिए।बुद्धिजीवी वर्ग इन विषयों को सोचता समझता है और विवेक से कार्य करता है।हमलोग अज्ञानता वश बिना जाने बिना समझे गूढ़ तथ्यों को शोर मचाते और एक दूसरे पे कटाक्ष करतें हैं तथा मरने मारने पे उतारु होते हैं।हमारे घर्म गुरु हमे जो कहतें हैं हम बिना दिमाग लगाये उसपे अमल करते हैं और परिणाम विध्वंश कारी सोच और नकारात्मकता को जन्म देकर उन्हें आदिकाल से पालपोस रहें। उपरवाले ने हमे इतनी खूबसूरत ज़िन्दगी दी है हम उसे ख़ूबसूरती से न जीकर एक उन्माद और विक्षिप्त जीवन जी रहें हैं धीरे धीरे हम विलुप्त होते चले जायेंगे।
दूसरे देश के विभिन धर्मों के लोग हमारी प्राचीन योग विधा को अपनाकर स्वस्थ और ऊर्जावान हो रहें हैं और हम आपस में धर्म के नाम पर लड़कर समाप्त हो रहें। मित्रों एक बार शांत मन से बैठकर इसपर विचार करो तब आपको स्वयं ज्ञात होगा कि आपके लिए क्या सही क्या गलत है।
पशु भी उठते ही अपने शरीर को खिंचाव देते हैं; बिल्ली सोकर उठते ही चारों पैर पर खड़ी होकर बीच का पेट उठकर अपने पीछे की और खींचती है। दो चार सेकंड ऐसा करने के बाद अपना काम करने लगती है।कुत्ता पिछले और अगले पांवों के सहारे शरीर को खींचता है।
योग को सही मायनों में जीवन में शामिल किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है क्योंकि इससे सदाचारिता, सच्चरिता, आध्यात्मिकता जैसे गुण सहज ही विकसित हो जाते हैं। अतः योग की शक्ति को भक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए।यह धर्म से जुडी पूजा पाठ की रस्म नहीं नहीं बल्कि स्वस्थ तन मन वाले सवा करोड़ भारतीयों के प्रिय भारत देश की सशक्त पहचान है। आज मोदी जी के प्रयास से इस भारतीय विरासत को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली है।

हमारा धर्म हमारे गुरु हमारे अंदर ही व्यापत हैं क्यों न हम उनके आदर्शों और उपदेशों पे चलें। हमारे विवेक हमारे ज़मीर से बढ़कर हमारा मार्गदर्शक हमारा गुरु और कौन होगा। जिस प्रकार गुरु हमे निर्देश देतें हैं राह बताते हैं उसी प्रकार हमारे अंदर के गुरु को रहबर और मार्गदर्शक बनाएं फिर देखिये कितना आसान हो जायेगा जीवन। आप कभी भ्रमित नही होंगे और अपने स्वार्थ के लिए कोई आपका इस्तेमाल नही कर सकेगा। मैंने निष्पक्ष बात रक्खी है किसी धर्म को ऊँचा या नीचा नही दिखाया न ही किसी का अपमान या दिल दुखाया। मैंने सिर्फ और सिर्फ एक इस देश का नागरिक और मानवता का धर्म निभाया । यदि मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ।आप सभी अपनी राय लिखें और इस मिशन में सहयोग करें।अपना धर्म तो निभायें।
मित्रों बहुत देर हो चुकी अब तो जागो अपने ज्ञान चक्षु खोल सही गलत का निर्णय कर स्वयं हित और देश का हित सोचो। सब धर्मों से बढ़कर राष्ट्र धर्म है सब हितों से बढ़कर देश हित है । योग को सही मायनों में जीवन में शामिल किया जाए तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है क्योंकि इससे सदाचारिता, सच्चरिता, आध्यात्मिकता जैसे गुण सहज ही विकसित हो जाते हैं। अतः योग की शक्ति को भक्ति विशेष से ना जोड़ा जाए।यह धर्म से जुडी पूजा पाठ की रस्म नहीं नहीं बल्कि स्वस्थ तन मन वाले सवा करोड़ भारतीयों के प्रिय भारत देश की सशक्त पहचान है। आज मोदी जी के प्रयास से इस भारतीय विरासत को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली है। देश सुरक्षित,सम्पन्न,समृद्ध तथा ऊर्जावान होगा तभी हम सब भी सुरक्षित,समृद्ध,संपन्न,ऊर्जावान और खुशहाल होंगे। भारतवर्ष ही एक मात्र देश है जहाँ सभी धर्मो को माना जाता है एवम् सभी धर्म और जाति के लोग एकसाथ रहतें हैं मिलजुल के। हमारी एकता और सौहार्द, धर्म और जाति के नाम पर लड़ाकर हमपे राज करना चाह रही क्या आप इतना भी नही समझते।
मेरी करबद्ध गुज़ारिश हैं आप सभी से कि वैमनस्यता त्याग कर अपना और देश हित सोचिये तथा अपना बहुमूल्य योगदान देकर देश को सशक्त बनायें। मेरे विचारों पे विचार करें और सही निर्णय लें। गर्व् से कहें हम भारतवासी हैं जहाँ सर्वधर्म की गंगा बहती है।
जयहिंद

            वंदे मातरम्